रामप्रसाद बिस्मिल की आत्मकथा | Ramprasad Bismil Ki Atamkatha Book PDF

Ramprasad Bismil Ki Atamkatha Biography PDF

पुस्तक का विवरण (Description of Book) :-

पुस्तक का नाम (Name of Book)रामप्रसाद बिस्मिल की आत्मकथा | Ramprasad Bismil Ki Atamkatha PDF
पुस्तक का लेखक (Name of Author)वैदिक प्रकाशन / Vedic publications
पुस्तक की भाषा (Language of Book)हिंदी | Hindi
पुस्तक का आकार (Size of Book)1 MB
पुस्तक में कुल पृष्ठ (Total pages in Ebook)180
पुस्तक की श्रेणी (Category of Book)जीवनी और आत्मकथाएँ / Biography and Autobiography

पुस्तक के कुछ अंश (Excerpts From the Book) :-

राम प्रसाद बिस्मिल का जन्म 11 जून 1897 को उत्तर प्रदेश की पावन धरती शाहजहाँपुर जिले के खिरनी बाग़ मोहल्ले में हुआ था। उनके पिता का नाम मुरलीधर और माता का नाम मूलमती था। राम प्रसाद अपने माता पिता की दूसरी सन्तान थे। पहली संतान पैदा होते ही मर गया था। बिस्मिल भी जब पैदा हुए तो इन्हें भी पहले बच्चे की तरह स्यात रोग हो गया था। इनके बचने की कोई उम्मीद नही थी। इनके माता–पिता को लोगों ने टोटका बताया कि सफेद खरगोश को शरीर पर घुमाकर जमीन पर छोड़ देने से यह रोग दूर हो जाता है।

यह टोटका सच साबित हुआ। जैसे ही सफ़ेद खरगोश को इनके शारीर पर घुमाकर छोड़ा गया तीन-चार चक्कर काटने के पश्चात खरगोश वही मर गया। इस टोटके के परिणामस्वरूप बिस्मिल को नया जीवन मिला। वे रोग मुक्त हो गए।
ज्योतिषी ने बिस्मिल को देखकर भविष्यवाणी की थी कि ऐसे दिव्य पुत्र का बचना बहुत ही मुश्किल होता है। यदि यह बालक बच गया तो जग में अपना नाम रोशन करेगा

बिस्मिल एक निरंतर जलने वाली मशाल थे। उनके क्रांतिकारी जीवन की छटा को देख – जानकर कर कोई भी उनके संघर्ष के प्रति नतमस्तक हो सकता है। वह सिर्फ उनके जीवन-युद्ध का ही लेखा-जोखा नहीं है बल्कि वहां मैनपुरी के जमाने से लेकर असहयोग और फिर काकोरी के रोमांचकारी घटनाक्रम की ऐसी तस्वीरें हैं जिनसे उस पूरे युग को जानने-समझने की दृष्टि को हासिल करके हम भविष्य के क्रांतिकारी संग्राम की नींव और काकोरी के समय के वैचारिक संघर्ष की रूपरेखा से हमारा आमना-सामना होता है । हम यह भी देख – जान पाते हैं

कि किस तरह उन्होंने अशफाकउल्ला के रूप में एक मुसलमान युवक को अपने संग्राम से जोड़कर अपने क्रांतिकारी अभियान और विचार को कौमी एकता की अनोखी विरासत सौंपी जिस पर आने वाली पीढ़ियां हमेशा गर्व करती रहेंगी। क्या यह जान-समझ नहीं लिया जाना चाहिए कि बिस्मिल के समय में क्रांतिकारी दल के संविधान में जिस शोषणमुक्त प्रजातांत्रिक समाज निर्माण की बात कही गई थी, आगे चलकर काकोरी की शहादतों के बाद चन्द्रशेखर आजाद और भगतसिंह के युग में दल के नाम के साथ ‘समाजवादी’ शब्द जोड़ने के बाद भी पार्टी के संविधान में कोई तब्दीली नहीं की गई।

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