अष्टांग हृदयम पुस्तक हिंदी पीडीएफ | Ashtanga Hridayam Ayurveda Granth PDF in Hindi

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पुस्तक का विवरण (Description of Book) :-

पुस्तक का नाम (Name of Book)अष्टांग हृदयम पुस्तक हिंदी पीडीएफ | Ashtanga Hridayam PDF in Hindi
पुस्तक का लेखक (Name of Author)महर्षि वाग्भट्ट / Maharishi Vagbhata
पुस्तक की भाषा (Language of Book)हिंदी | Hindi
पुस्तक का आकार (Size of Book)72 MB
पुस्तक में कुल पृष्ठ (Total pages in Ebook)387
पुस्तक की श्रेणी (Category of Book)आयुर्वेद / Ayurveda, स्वास्थ्य / Health

पुस्तक के कुछ अंश (Excerpts From the Book) :-

अष्टाङ्गहृदयम्, आयुर्वेद का प्रसिद्ध ग्रंथ है। इसके रचयिता वाग्भट हैं। इसका रचनाकाल ५०० ईसापूर्व से लेकर २५० ईसापूर्व तक अनुमानित है। अष्टांग हृदयम पुस्तक हिंदी पीडीऍफ़ में आपको औषधि (मेडिसिन) और शल्यचिकित्सा दोनो के बारे में पढ़ने को मिलेगा। इस पोस्ट में आप बड़ी आसानी से ashtanga hridayam pdf in hindi / अष्टांगहृदयम् आयुर्वेद ग्रंथ हिंदी पीडीएफ डाउनलोड कर सकते हैं।

अष्टांग हृदयम पुस्तक यह ग्रंथ स्वास्थ के आधार पर है की किसी भी मनुष्य को किस तरह से खाना पीना, रहना सहना चाहिए आदि। ऐसे तो इस ग्रंथ को कब रचना हुआ कोई प्रमाण नहीं मिला है, लेकिन अनुमानत: माना जाता है कि इस ग्रन्थ का रचनाकाल ५०० ईसापूर्व से लेकर २०० ईसापूर्व तक है।

आयुर्वेदीय वाङ्मय का इतिहास ब्रह्मा इन्द्र आदि देवों से सम्बन्धित होने के कारण अत्यन्त प्राचीन, गौरवास्पद एवं विस्तृत है। भगवान् धन्वन्तरि ने इस आयुर्वेद को ‘तदिदं शाश्वतं पुष्यं स्वर्ग्य यशस्यमायुष्यं वृत्तिकरं चेति’ (सु.सू. १११९ ) कहा है। लोकोपकार की दृष्टि से इस विस्तृत आयुर्वेद को बाद में आठ अंगों में विभक्त कर दिया गया। तब से इसे ‘अष्टांग आयुर्वेद’ कहा जाता है।

इन अंगों का विभाजन उस समय के आयुर्वेदज्ञ महर्षियों ने किया। कालान्तर में कालचक्र के अव्याहत आपात से तथा अन्य अनेक कारणों से ये अंग खण्डित होने के साथ प्रायः लुप्त भी हो गये। शताब्दियों के पश्चात् ऋषिकल्प आयुर्वेदविद् विद्वानों ने आयुर्वेद के उन खण्डित अंगों की पुनः रचना की खण्डित अंशों की पूर्ति युक्त उन संहिता 1 ग्रन्थों को प्रतिसंस्कृत कहा जाने लगा, जैसे कि आचार्य दृढबल द्वारा प्रतिसंस्कृत चरकसंहिता । इसके अतिरिक्त प्राचीन खण्डित संहिताओं में भेड (ल) संहिता तथा काश्यपसंहिता के नाम भी उल्लेखनीय हैं।

तदनन्तर संग्रह की प्रवृत्ति से रचित संहिताओं में अष्टांगसंग्रह तथा अष्टांगहृदय संहिताएं प्रमुख एवं सुप्रसिद्ध हैं। परवर्ती विद्वानों ने वर्गीकरण की दृष्टि से आयुर्वेदीय संहिताओं का विभाजन बृहत्त्रयी तथा लघुत्रयो के रूप में किया। बृहत्त्रयी में चरकसंहिता, सुश्रुतसंहिता तथा अष्टांगहृदय का समावेश किया गया है, क्योंकि ‘गुणा गुणज्ञेषु गुणा भवन्ति’। यह भी तथ्य है कि वाग्भट की कृतियों में जितना प्रचार-प्रसार ‘अष्टांगहृदय’ का है, उतना ‘अष्टांगसंग्रह’ का नहीं है। इसी को आधार मानकर बृहत्त्रयी रत्नमाला में ‘हृदय’ रूप रत्न को लेकर पारसियों ने गूंथा हो ?


चरक-सुश्रुत संहिताओं की मान्यता अपने-अपने स्थान पर प्राचीनकाल से अद्यावधि अक्षुण्ण चली आ रही है। अतएव इनका पठन पाठन तथा कर्माभ्यास भी होता आ रहा है। यह भी सत्य है कि पुनर्वसु आत्रेय तथा भगवान् धन्वन्तरि के उपदेशों के संग्रहरूप उक्त संहिताओं में जो लिखा है, वह अपने-अपने क्षेत्र के भीतर आप्त तथा आर्य वचनों की चहारदिवारी तक सीमित होकर रह गया है तथा उक्त महर्षियों ने पराधिकार में हस्तक्षेप न करने की प्रतिज्ञा कर रखी थी।

यह उक्त संहिताकारों का अपना-अपना उज्ज्वल चरित्र था। महर्षि अग्निवेश प्रणीत कायचिकित्सा का नाम चरकसंहिता और भगवान् धन्वन्तरि द्वारा उपदिष्ट शल्यतन्त्र का नाम सुश्रुतसंहिता है ये दोनों ही आयुर्वेदशास्त्र की धरोहर एवं अक्षयनिधि हैं। उन-उन आचार्यों द्वारा इनमें समाविष्ट विषय विशेष आयुर्वेदशास्त्र के जीवातु हैं, अतएव ये संहिताएं समाज की परम उपकारक हैं।

अष्टांगहृदय में 6 खण्ड, 120 अध्याय एवं कुल 7120 श्लोक हैं। अष्टांगहृदय के छः खण्डों के नाम निम्नलिखित हैं-

१) सूत्रस्थान (३० अध्याय)
२) शारीरस्थान (६ अध्याय)
३) निदानस्थान (१६ अध्याय)
४) चिकित्सास्थान (२२ अध्याय)
५) कल्पस्थान (६ अध्याय)
६) उत्तरस्थान (४० अध्याय)

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अष्टांग हृदयम में क्या लिखा है?

अष्टांगहृदय में आयुर्वेद के सम्पूर्ण विषय- कायचिकित्सा, शल्यचिकित्सा, शालाक्य आदि आठों अंगों का वर्णन है। उन्होंने अपने ग्रन्थ के विषय में स्वयं ही कहा है कि, यह ग्रन्थ शरीर रूपी आयुर्वेद के हृदय के समान है।

अष्टांग संग्रह के लेखक कौन है?

इसके रचयिता वाग्भट हैं।

अष्टांग हृदयम में कितने स्थान हैं?

अष्टांग हृदयम को कुल 7471 श्लोकों के साथ 6 स्थानों में विभाजित किया गया है।

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