इक्ष्वाकु के वंशज PDF | Ikshvaku Ke Vanshaj Hindi Book Free

Ikshvaku Ke Vanshaj pdf

इक्ष्वाकु के वंशज ( Ikshvaku Ke Vanshaj PDF ) के बारे में अधिक जानकारी

पुस्तक का नाम (Name of Book)इक्ष्वाकु के वंशज / Ikshvaku Ke Vanshaj
पुस्तक का लेखक (Name of Author)Amish
पुस्तक की भाषा (Language of Book)हिंदी | Hindi
पुस्तक का आकार (Size of Book)86 MB
पुस्तक में कुल पृष्ठ (Total pages in Ebook)346
पुस्तक की श्रेणी (Category of Book)उपन्यास / Novel

पुस्तक के कुछ अंश (Excerpts From the Book) :-

अपने लंबे, कसे हुए और मज़बूत शरीर को राम नीचे को हुए। अपना वज़न दाहिने घुटने पर डालते हुए, उन्होंने मज़बूती से थामा। बाण को धनुष सही जगह लगाया, लेकिन वह जानते थे कमान को पहले ज्यादा नहीं खींचना चाहिए। वह अपनी मांसपेशियों पर तनाव नहीं डालना चाहते थे। उन्हें सही समय का इंतज़ार करना था। हमला अकस्मात् होना चाहिए।
‘दादा, वह जा रहा लक्ष्मण ने अपने बड़े भाई से फुसफुसाते हुए कहा । राम ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी। उनकी आंखें शिकार पर टिकी थीं। हल्की हवा उनके उन खुले बालों को हिला रही थी, जो सिर पर बंधे जूड़े में आने से रह गए थे। उनकी अस्त-व्यस्त, रोएंदार दाढ़ी और सफेद धोती हवा के साथ ताल मिला रही थीं। राम ने हवा की दिशा को समझते हुए अपना कोण सही किया । उन्होंने शांति से अपना सफेद अंगवस्त्र अलग किया, जिससे उनके सांवले धड़ पर युद्ध के विजयी निशान दिखने लगे। लक्ष्य भेदते समय अंगवस्त्र मध्य में नहीं आना चाहिए।

हिरण अचानक निस्तब्ध हो गया; शायद उसे अनहोनी का आभास हुआ होगा। असहजता से पैर घसीटते हुए, उसके हांफने की आवाज़ राम सुन सकते थे। कुछ पल बाद वह फिर से पत्तियां चबाने लगा। उसका बाकी झुंड थोड़ी ही दूरी पर था, जो घने जंगल की वजह से दिखाई नहीं दे रहा था।

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