Rusti Ke Karname – Ruskin Bond | रस्टी के कारनामे – रस्किन बॉण्ड

Rusti Ke Karname Book PDF Details:

पुस्तक का नाम (Name of Book)Rusti Ke Karname – Ruskin Bond | रस्टी के कारनामे – रस्किन बॉण्ड
पुस्तक का लेखक (Name of Author)Ruskin Bond
पुस्तक की भाषा (Language of Book)Hindi
पुस्तक का आकार (Size of Book)5 MB
पुस्तक में कुल पृष्ठ (Total pages in Ebook)98
पुस्तक की श्रेणी (Category of Book)कहानी / Story

Rusti Ke Karname Book Summary

रस्टी के करनामे – हिंदी पीडीएफ एक रोमांचक और मनोहारी कहानी संग्रह है जो बचपन की यादें ताजगी देता है। इस पुस्तक में रस्टी नामक एक छोटे लड़के के जीवन के कुछ रोमांचक और रोमांटिक किस्से दिए गए हैं। यह पुस्तक बचपन की खुशियों, दोस्ती और साहस की कहानियों से भरी हुई है।

विषय-सूचीपृष्ठ
केन काका6
दादी की अद्भुत रसोई12
दादी के अचार17
निठल्ले केन काका22
केन काका की नौकरी28
केन काका ने कार चलायी32
केन काका क्रिकेट खेले38
स्कूल से भागना44
मोम्बासा जाने की शानदार योजना50
चांदनी रात में बैठक56
ढाबे की चाय62
बाघ और बैलगाड़ी66
बाल-बाल बचे71
चांदनी चौक में पड़ाव76
ममता के साथ-साथ85
जयपुर के बाहर डाकुओं से मुठभेड़92
कपड़ों की चोरी और सीनाजोरी98
जामनगर105

प्रस्तुत पुस्तक के कुछ अंश

दादी की अद्भुत रसोई

दादी का रसोईघर उतना बड़ा तो नहीं था जितने बड़े आम रसोईघर होते हैं। सोने के कमरे जितना बड़ा या बैठक जितना लंबा-चौड़ा भी नहीं था, लेकिन खासा बड़ा था, और उसके साथ लगा हुआ रसोई-भंडारगृह भी था। दादी का रसोईघर इस दृष्टि से अद्भुत था कि उसमें ढेर सारी चीजें बनती थीं। खाने-पीने के बढ़िया और स्वादिष्ट व्यंजन, जैसे कबाब, सालन, चाकलेट वाली मिठाई और चीनिया बादाम वाली टॉफी, मीठी चटनियां और अचार-मुरब्बे, गुलाब जामुन, गोश्त की कचौरी और समोसे, सेब के समोसे, मसालेदार ‘टर्की’, मसालेदार मुर्गी, भरवां बैंगन और मसालेदार मुर्गीवाला भरवां हैम। भोजन बनाने में दुनिया में दादी का कोई मुकाबला नहीं था।

जिस शहर में हम रहते थे, उसका नाम देहरादून था। यह आज भी है। मगर आजादी के बाद यह शहर बहुत फैल गया है और यहां की हलचल और भीड़-भाड़ भी बढ़ गयी है। दादी का अपना घर था- विशाल मगर बेतरतीब तरीके से बना बंगला, जो शहर की सीमा-रेखा पर था। बंगले के अहाते में बहुत सारे पेड़ थे। इनमें अधिकतर पेड़ फलों के थे, जैसे आम के पेड़, लीची के पेड़, अमरूद के पेड़, केले के पेड़, पपीते के पेड़, नींबू के पेड़, आदि। इतने सारे पेड़ थे उस बंगले के अहाते में ! इनमें एक कटहल का विशाल पेड़ भी था, जिसकी छाया घर की दीवारों पर पड़ती थी।

‘धन्य है वह घर, जिसकी दीवारों पर पड़ती है बूढ़े पेड़ की ठंडी-नरम छांव…’

दादी के ये शब्द आज भी अच्छी तरह याद हैं मुझे। कितनी सच्ची और खरी बात कहती थीं दादी, क्योंकि वह घर बड़ा सुखकर था, खासकर नौ बरस के उस बालक के लिए, जिसकी भूख बहुत तेज थी।

अगर भोजन बनाने के मामले में दादी का कोई सानी नहीं था, तो मुझ जैसा भोजनभट्ट यानी पेटू भी कोई न था। मैं इस नाते भाग्यशाली था कि हर बच्चे की ऐसी दादी नहीं होती जो किसी फरिश्ते की तरह पाक-विद्या में निपुण हो, बशर्ते कि फरिश्ते भी रसोई वगैरह बनाते हों)।

हर साल जाड़ों में जब मैं बोर्डिंग स्कूल से घर लौटता, तो असम में अपने माता-पिता के साथ छुट्टियां बिताने से पहले कम से कम एक महीने के लिए मैं अपनी दादी के पास चला आता था। असम में मेरे पिता एक चाय बागान के मैनेजर थे। बेशक चाय बागान में भी मौज-मस्ती रहती थी, लेकिन मेरे माता-पिता ने कभी अपने हाथों से रसोई नहीं बनाई थी।

उन्होंने इस काम के लिए एक खानसामा रखा हुआ था, जो मटन करी तो अच्छी बनाता था, मगर इसके अलावा और कुछ बनाना उसे नहीं आता था। रात को भी भोजन में वही गोश्त मिले तो रोटी गले से नीचे नहीं उतरती खासकर उस लड़के को बार-बार वही गोश्त कैसे अच्छा लग सकता था जिसकी जीभ को भांति-भांति के व्यंजनों का चस्का लग चुका हो।

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