कोक शास्त्र रति रहस्य | Kok Shastra Ratirahasya Hindi PDF

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पुस्तक का विवरण (Description of Book) :-

पुस्तक का नाम (Name of Book)कोक शास्त्र रति रहस्य / Kok Shastra Ratirahasya
पुस्तक का लेखक (Name of Author)कोका पंडित / Koka Pandit
पुस्तक की भाषा (Language of Book)हिंदी | Hindi
पुस्तक का आकार (Size of Book)7 MB
पुस्तक में कुल पृष्ठ (Total pages in Ebook)130
पुस्तक की श्रेणी (Category of Book)आयुर्वेद / Ayurveda

पुस्तक के कुछ अंश (Excerpts From the Book) :-

स्वपेद्धमानप्रमत्ता क्षपे देव महत्रयम् || स्नायीत च त्रिरात्रान्ते सचैल मुदिते खौ । क्षामालंकृतवाप्नोति पुत्रंपूजितलक्षणम् (व्यासजी)
‘व्यासजी महाराज कहते हैं कि जब स्त्री रजोधर्म को प्राप्तहो, तब तीन दिन के लिये सब काम को छोड़दे. इत्यादि यह वचन भी पूर्वो क्त वचनों के अनुसार ही है, इसी कारण इनका अनुवाद नहीं लिखा गया ||
घस पूर्वोक्त ऋषियोंके वचनों से यह सिद्ध होता है, कि स्त्री में विष है पूर्वोक्त महात्माओंकी आज्ञा उल्लंघन करके जो मनुष्य रजस्वला स्त्री से संसर्ग करता है, वह निश्चयही जीवन पर्यन्त मानसिक और शारीरिक सुख वञ्चित रहता है।
इसकारण मनुष्य की इच्छा यांद निरोग दीर्घ जीवन प्राप्त करके सुखसे समय व्यतीत करने की हो, तो यौवनअवस्था के सङ्गसङ्ग स्फुट भाव से : विष वेग उच्छलित हो उठने पर अधिक अवस्था चाली कन्याका पाणिग्रहण न करे, किन्तु पूर्वोक्त चिपके कराल कचल से आत्म रक्षा करनके निमित्त चाल्यावस्था में ही विवाह करना योग्य है।
अतश्व संसारके कल्याणार्थ त्रिकालज्ञ आर्य कुलावंतश अनेक धर्म तत्व वेत्ता और शरीर तत्व वेत्ता महात्मा लोग एक स्वर से कह गये हैं कि, आठ, नौ, दश वर्ष की कन्याका विवाह करनाही उत्तम है । यौवनवती कन्या का विवाह करना वारंवार शपथ पूर्वक निषेध फर गये हैं ।
अतएव चाल विवाह भली भाँति से युक्ति युक्त धर्म मूलफ और विज्ञान प्रसूत है या नहीं; इसवात का विचार चित्ता शीत विद्वान लोगही करसक्त है ।”
मैं यह नहीं कहता कि, मेरे दिखाये हुए प्रमाण और युक्तिही वाल विवाह में एक मात्र यथेष्ट कारण हैं, किन्तु विचार शील विद्वानों को विचार करने के निमित्त इससे यत् किंचित् भी सहायता मिलेगी, तो मैं अपने परिश्रम को सफल मानूगा इसको अपेक्षा और भी अनेक सूक्ष्म कारण होंगे, किन्तु वे मेरी लमान स्थूल बुद्धि की बुद्धि से परे हैं ।
फोर्ड चालविवाह यह भी कारण बताते हैं कि युवावस्थामैत्र के मनकी चंचलता अत्यन्त प्रचल होजाती है, उसचपलताके रोकने समार्थ प्रायः उनमें नहीं होती, इसकारण से वे कुमार्ग गामिनी होकर पताके कुलको कलङ्कृत करडालती हैं, इसलिये रजोधर्म से पहले ही कन्याका विवाहकर देना उचित है। शाक्तानन्द तरङ्गिणी के ज्ञान साध्य में भगवान् शंकर स्वामी ने इसही मतकी पुष्टि की है।

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